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Date: 21-02-2017

टाटा ग्रुप के चेयरमैन का चार्ज लेंगे चंद्रशेखरन, JRD टाटा जैसा डेकोरेट कराया ऑफिस




मुंबई.टाटा ग्रुप के 92 साल पुराने हेडक्वार्टर 'बॉम्बे हाउस' को आज नया बॉस मिलने वाला है। टाटा ग्रुप में नई जिम्मेदारी संभालने के लिए एन. चंद्रशेखरन ऑफिस पहुंच चुके हैं। उन्हें कार्यभार देने के लिए रतन टाटा भी पहुंचे हैं। चंद्रा 149 साल पुराने ग्रुप के पहले गैर पारसी चेयरमैन होंगे। इसके लिए चौथे फ्लोर पर कार्नर रूम यानी चेयरमैन ऑफिस को चंद्रा के लिए वैसा ही डेकोरेट किया गया है, जैसा 1980 के दशक में चेयरमैन जेआरडी टाटा और उसके बाद रतन टाटा के वक्त था। 2012 में चेयरमैन बने साइरस मिस्त्री ने रूम का लेआउट बदल दिया था।मिस्त्री के बाद चेयरमैन बने चंद्रा... Advertisement - टाटा सन्स के चेयरमैन पद से 24 अक्टूबर 2016 को मिस्त्री को हटाया गया था। तब रतन टाटा खेमे ने कहा था कि मिस्त्री के फैसले टाटा की परंपराओं से मेल नहीं खाते। - ऐसे में, चंद्रा जेआरडी टाटा के समय जैसा ऑफिस डेकोरेट कराकर यह संकेत देने की कोशिश कर रहे हैं कि वह कंपनी की परंपराओं को आगे बढ़ाएंगे। - 54 साल के चंद्रशेखरन का पॉपुलर नाम 'चंद्रा' है। चंद्रा को टीसीएस का भी चेयरमैन बनाया गया है। उनकी जगह रजेश गोपीनाथन नए सीईओ होंगे। चुनौतियां 1. ब्रिटेन में टाटा स्टील को मंदी से निकालना - नए चेयरमैन मैराथन मैन चंद्रा के सामने सबसे पहली चुनौती तो यही है कि रतन टाटा-मिस्त्री बोर्डरूम विवाद से समूह की छवि को जो नुकसान पहुंचा है, उसकी भरपाई कैसे हो। साथ ही, कारोबार को फिर से आगे बढ़ाया जा सके। टाटा स्टील का इंग्लैंड का बिजनेस लगातार घाटे में चल रहा है। कुछ हिस्सा बेचने का भी फैसला हुआ है। चंद्रा को तय करना होगा कि कौन-सा हिस्सा बेचा जाना चाहिए और किस यूनिट को मुनाफे में लाया जा सकता है। 2. टाटा के ड्रीम प्रोजेक्ट नैनो को फिर से खड़ा करना - रतन टाटा का ड्रीम प्रोजेक्ट नैनो फेल रहा है। इसका घाटा 1,000 करोड़ रुपए को पार कर गया है। इससे पूरे टाटा मोटर्स के प्रदर्शन पर असर पड़ा। मिस्त्री इस प्रोजेक्ट के खिलाफ थे। उन्होंने टाटा पर आरोप लगाया था कि टाटा अपने अहम के चलते इस प्रोजेक्ट को बंद नहीं कर रहे हैं। अब चंद्रा को फैसला लेना होगा कि घाटे के बावजूद प्रोजेक्ट के कब तक जिंदा रखा जा सकता है। खासकर, यह देखते हुए कि टाटा मोटर्स की सभी यूनिट्स को मुनाफे में लाने का टारगेट है। बॉम्बे हाउस बनाने वाले विटेट टाटा इंजीनियरिंग के हेड भी बने थे - मुंबई में फ्लोरा फाउंटेन के पास यह 4 मंजिला बिल्डिंग है। यह मलाड पत्थरों से बनी है। - आर्किटेक्ट जार्ज विटेट ने इसे बनाया था। कंपनी की 40 बिल्डिंग डिजाइन की थी। - विटेट टाटा इंजीनियरिंग कंपनी के हेड भी बने। अब यह कंपनी टाटा मोटर्स है। ऐसा था जेआरडी टाटा का ऑफिस - रतन टाटा ने 1991 में यह ऑफिस संभाला था। कुछ साल उन्होंने इस ऑफिस में कोई बदलाव नहीं किया। - बाद में रतन टाटा ने जेआरडी टाटा की कुर्सी, टेबल और स्टेशनरी को पुणे की अर्काइव बिल्डिंग में भेजा। यहां जेआरडी के दफ्तर का रिप्लिका बनाया गया। 16 हजार करोड़ रुपए के शेयर खरीदेगी टीसीएस - आईटी कंपनी टीसीएस ने देश के सबसे बड़े शेयर बायबैक का एलान किया है। कंपनी बाजार से 16,000 करोड़ रुपए के शेयर खरीदेगी। इससे पहले रिलायंस इंडस्ट्रीज ने 2012 में 10,400 करोड़ रुपए का बायबैक किया था। - टीसीएस 2,850 रुपए के भाव पर 2.85% यानी 5.61 करोड़ शेयर खरीदेगी। बायबैक की कीमत मौजूदा शेयर भाव 2,506.50 रुपए से 13.7% ज्यादा है। बीएसई में शेयर 4.08% चढ़ गए। टीसीएस में टाटा सन्स की 73.3% होल्डिंग है। कंपनी के पास 43,169 करोड़ रुपए का कैश है। क्यों चुने गए चंद्रशेखरन? 1. देश के सबसे कामयाब ऑपरेटिंग सीईओ। वे रतन टाटा के सबसे भरोसेमंद लोगों में माने जाते हैं। 2. टाटा ग्रुप को अच्छी तरह समझते हैं। 30 साल से ग्रुप से जुड़े हैं। करियर की शुरुआत भी टाटा ग्रुप से बतौर सॉफ्टवेयर प्रोग्रामर की थी। मैराथन रनर चंद्रशेखरन खुद कह चुके हैं कि वे लंबी रेस में दौड़ने जैसा सोचते हैं। 3. टाटा सन्स को उम्मीद है कि चंद्रशेखरन आईटी बैकग्राउंड होने के कारण टाटा ग्रुप का डिजिटल मेकओवर कर सकते हैं। उन्होंने 2009 में टीसीएस की कमान संभाली थी। हर साल कंपनी की कमाई बढ़ाई। मैराथन और फोटोग्राफी के शौकीन हैं चंद्रशेखरन - चंद्रशेखरन का जन्‍म तमिलनाडु के मोहनुर में हुआ था। फिलहाल, वे मुंबई में रहते हैं। पत्‍नी का नाम ललिता और बेटे का नाम प्रणव है। - वे बेहतरीन फोटोग्राफर हैं। इसके अलावा एम्सटर्डम, बोस्‍टन, शिकागो और मुंबई समेत कई जगह मैराथन में हिस्‍सा ले चुके हैं। - चंद्रशेखरन 5 मार्च 2016 से RBI के नॉन ऑफिशियल डायरेक्टर भी हैं। - वे रोज सुबह रनिंग जरूर करते हैं, क्योंकि उनकी फैमिली में डायबिटीक हिस्ट्री है। - चंद्रा के पिता का नाम श्रीनिवासन नटराजन है। वे वकील थे, लेकिन ज्यादातर वक्त खेती में गुजारते थे।


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