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Date: 20-02-2017

आलेख : बैंकिंग सुधारों का नया परिदृश्य - जयंतीलाल भंडारी




हाल ही में सरकार ने देश के इतिहास में सबसे बड़े बैंकिंग एकीकरण को हरी झंडी दिखाते हुए भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) में पांच सहायक बैंकों (स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एंड जयपुर, स्टेट बैंक ऑफ मैसूर, स्टेट बैंक ऑफ त्रावनकोर, स्टेट बैंक ऑफ पटियाला और स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद) के विलय प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। ऐसे में अब देश में एक वैश्विक बैंक बनने का रास्ता साफ हो गया है। स्टेट बैंक विलय प्रक्रिया अगले वित्त वर्ष (2017-18) की शुरुआत तक पूरी होने की संभावना है। ऐसा होने पर एसबीआई 37 लाख करोड़ रुपए की परिसंपत्ति के साथ दुनिया का 44वें क्रम का बड़ा वैश्विक बैंक बन जाएगा। गौरतलब है कि दुनिया के सबसे बड़े बैंकों की सूची में पहले पायदान पर चाइनीज बैंक आईसीबीसी है, जिसकी कुल परिसंपत्तियां एसबीआई की नई संपत्ति की तुलना में करीब सात गुना है। वस्तुत: किसी देश का स्थिर बैंकिंग सिस्टम कुछ बड़े बैंक स्तंभों पर खड़ा होता है। ऐसा बैंकिंग सिस्टम ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर, थाईलैंड और मलेशिया जैसे बाजारों में मौजूद है। भारत में एसबीआई जैसे बड़े बैंक में सहायक बैंकों के विलय से जहां उद्योग, कारोबार व विभिन्न् वर्गों की कर्ज की बड़ी जरूरत पूरी होंगी, वहीं सरकार के वित्तीय समायोजन के लक्ष्य को साधने में भी मदद मिलेगी। साथ ही मजबूत बैंकिंग सिस्टम से देश की अर्थव्यवस्था को भी भारी संबल मिलेगा। हाल ही में ग्लोबल क्रेडिट रेटिंग एजेंसी फिच द्वारा प्रकाशित बैंकिंग रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में जहां एक ओर मौजूदा वैश्विक परिप्रेक्ष्य में सरकारी बैंकों को मिलाकर एक बड़ा बैंक बनाए जाने की मुहिम आगे बढ़ी है, वहीं दूसरी ओर फंसे बैंक कर्ज (एनपीए) से अर्थव्यवस्था को बचाया जाना जरूरी है। चूंकि अब देश में सबसे बड़े बैंकिंग एकीकरण पर सरकार ने मुहर लगा दी है, ऐसे में बढ़ते एनपीए से अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए रणनीतिक कदम आगे बढ़ाने होंगे। निस्संदेह देश के बैंकों के समक्ष बढ़ता एनपीए एक बड़ी चुनौती है। इसे देखते हुए केंद्र सरकार ने कानून बनाया है कि यदि बैंक कर्ज नहीं लौटाया तो कर्ज लेते समय गारंटीस्वरूप रखी गई संपत्ति व प्रतिभूति को बैंक जब्त कर सकता है। गौरतलब है कि बैंकों के फंसे हुए कर्ज देश की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं। 31 मार्च 2016 की स्थिति के अनुसार देश के सरकारी बैंकों के 100 सबसे बड़े फंसे हुए कर्जदारों पर कुल 1.73 लाख करोड़ रुपए बकाया है। देश में 7,686 ऐसे इरादतन डिफॉल्टर हैं, जिन पर सरकारी बैंकों के 66,190 करोड़ रुपए बकाया हैं। वैश्विक ख्याति प्राप्त संगठन मूडीज इन्वेस्टर सर्विस द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का लंबे समय से बढ़ता एनपीए और बढ़ते बड़े बैंक बकायादार भारत की वित्तीय साख के लिए खतरा हैं। भारत में एनपीए सीमा से बहुत अधिक बढ़कर राजकोषीय स्थिति पर असर डाल रहा है। उद्योग मंडल एसोचैम की रिपोर्ट में कहा गया है कि मार्च 2016 के अंत तक बैंकों की कुल दबाव वाली संपत्तियां (एनपीए और पुनर्गठित संपत्तियां) बढ़कर 10 लाख करोड़ रुपए पर पहुंच गई हैं। बैंकों की ऐसी दबाव वाली संपत्तियों में बैंकों के बड़े कर्जदाताओं की संख्या चिंताजनक रूप से बढ़ गई है। 70 फीसदी के करीब एनपीए औद्योगिक घरानों का है। इस फंसे हुए कर्जों ने बैंकों के मुनाफे को बुरी तरह प्रभावित किया है। यद्यपि देश में बैंकिंग क्षेत्र में धोखाधड़ी रोकने व कर्जों की वसूली के लिए कई कानून हैं, लेकिन इनसे कारगर परिणाम नहीं मिल पा रहे हैं। कारण कि उनका प्रवर्तन सही ढंग से नहीं हो पा रहा है। मसलन, बैंक ऋण वसूली पंचाट (डीआरटी) पर भरोसा करते हैं, जिसका गठन वर्ष 1993 के कानून के तहत किया गया था। नियम के मुताबिक ऋण संबंधी मामलों का छह माह के भीतर निपटारा होना चाहिए, लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा है। देशभर में सारे पंचाट मिलकर भी सालभर में 12 हजार से ज्यादा मामले नहीं निपटा पा रहे हैं। इस समय देशभर में कार्यरत कोई 33 पंचाट में करीब 60 हजार से अधिक मामले लंबित हैं। इनमें बैंकों के 38 खरब रुपए से भी अधिक की धनराशि फंसी हुई हैं। चिंता की बात यह भी है कि पंचाटों में करीब 10 फीसदी मामलों में ही वसूली हो पाती है। अब सरकारी क्षेत्र के बैंकों को एक ऐसी संस्थागत प्रणाली की आवश्यकता है, जिससे उपयुक्त बैंकिंग परिचालन माहौल तैयार किया जा सके, जो बैंकों के कर्ज को राजनीतिक तथा अन्य दबावों से सुरक्षित कर सके। इस परिप्रेक्ष्य में बैंकिंग से संबंधित देश के कानूनी ढांचे में भी त्वरित सुधार की जरूरत है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि वर्ष 2017-18 के नए बजट के तहत वित्तमंत्री अरुण जेटली ने बैंकिंग क्षेत्र में सुधार के लिए जो घोषणाएं की हैं, उनके क्रियान्वयन पर नए वित्त वर्ष की शुरुआत से ही ध्यान देना होगा। वर्ष 2017-18 में सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में 10,000 करोड़ रुपए की इक्विटी पूंजी निवेश करने का प्रस्ताव किया है और कहा है कि जरूरत पड़ने पर बैंकों में और पूंजी डाली जा सकती है। एनपीए के बोझ से दबे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को सरकार की ओर से ज्यादा पूंजी की जरूरत होगी, क्योंकि कम मूल्यांकन के कारण वह बाजार से पैसा जुटाने में कठिनाई का सामना कर रहे हैं। केंद्रीकृत सार्वजनिक क्षेत्र परिसंपत्ति पुनर्वास एजेंसी (पीएआरए) को गठित करके फंसे हुए कर्ज के निपटारे का प्रभावी समाधान किया जाना होगा। यह एजेंसी बड़े और चुनौतीपूर्ण मामलों का जिम्मा ले सकती है और फंसे हुए कर्ज को कम करने के लिए सियासी रूप से कड़े निर्णय भी कर सकती है, जिसमें गैर-निष्पादित आस्तियां और पुनर्गठित कर्ज भी शामिल हैं। बैंकिंग क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने गैर-निष्पादित परिसंपत्ति के लिए मंजूरी योग्य प्रावधान को 7.5 फीसदी से बढ़ाकर 8.5 फीसदी करने का जो प्रस्ताव किया है, उसका कारगर क्रियान्वयन जरूरी है। बैंकों के बड़े बेईमान चूककर्ताओं से सरकार को सख्ती से पेश आना होगा। इससे वर्ष 2017-18 में बैंकों की कर देनदारी में कमी आएगी। इसी परिप्रेक्ष्य में बजट में एक प्रावधान भी किया गया है, जिसके तहत बैंकों की रकम लेकर फरार लोगों की जायदाद जब्त की जाएगी। इस संदर्भ में विजय माल्या जैसे बड़े कारोबारी की मिसाल सामने हैं, जो बैंकों का भारीभरकम कर्ज चुकाए बिना देश से फरार हो गए। सरकार की यह घोषणा काफी अहम मानी जा रही है, क्योंकि दिवालियापन व अन्य दूसरे कानूनों के साथ ये नया प्रावधान बैंकों को कर्ज वसूलने हेतु और ज्यादा अधिकार देगा। हम आशा करें कि केंद्र सरकार के बैंकिंग सुधारों के नए प्रयास और रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल का सफल मौद्रिक नीति संबंधी अनुभव देश में बैंकों को मजबूत बनाने और उन्हें फंसे कर्ज के बोझ से निजात दिलाते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में सार्थक भूमिका निभाएगा।


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